अध्यात्म (SPIRITUALISM)
अध्यात्म (SPIRITUALISM)
एक ऐसी धारणा जिसमें ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के संदर्भ में यह अटल विश्वास हो कि इनकी रचना अवश्य ही कि सर्वशक्तिमान शक्ति (साकार/ निराकार) के द्वारा की गई है, अध्यात्म कहलाता है। इसे हम इस प्रकार से भी कह सकते है कि अध्यात्म एक ऐसी विचार शक्ति है जिसमें ब्रह्म अथवा परमेश्वर को परिकल्पना
की गई है। यह विचार शाश्वत एवं सर्वमान्य है।
अध्यात्मशास्त्र
1) दर्शन (PHILOSOPHY) – षड्दर्शन (भारतीय) दर्शन में हमें अध्यात्म सम्वन्धी जिज्ञासाओं का तर्कपूर्ण
समाधान प्राप्त होता है।
१) वेदान्त :- वेदान्त हमें तर्कसम्मत निराकार, ब्रह्म का ज्ञान कराता है। वेदान्त वेदो का सार है। 3) श्रीमद्
भगवदगीता :- गीता से हमें साकार एवं निराकार परमेश्वर के बारे में पता चलता है तथा यह भी ज्ञान होता है
कि परमात्मा केवल एक है और वो कौन है ? गीता उपनिषदों का सार है।
II धर्म
धर्म की दो परिभाषाये है।
1) सदगुण जैसे कि सत्य, न्याय, प्रेम, भक्ति इत्यादि को धर्म कहा गया है।
2) जीवन में कर्तव्यो या परिपालन भी धर्म कहलाता है। अधर्म झूठ, पाप, दुराचार, हिंसा आदि अध्चर्म में अन्तर्गत आते है।
ज्ञान
1.कर्म
सत्त्व, रज, तम
(धर्म संहिता)
2.भक्ति (सव धर्म)
ज्ञान कृपा (INTUTION)
मर्यादा एवं अनुशासन स्वच्छन्दता नहीं स्वतन्त्रता।
नौ उत्तम धर्म करने के लिये उत्तम ज्ञान आवश्यक है।
# भक्ति यदि ज्ञानयुक्त (LOGIC+ भावपूर्ण) की जाये तो सर्वोत्तम है परन्तु परमात्मा की कृपा (BY GRACE of GOD) होने पर INTUTION (अन्तरात्मा) द्वारा ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। क्योकि भक्ति में भाव (शुद्ध हृदय) की प्रधानता होती है व ज्ञान SECONDARY चीज है।
# शुद्ध भक्ति वह होती है जिसमें प्रेम व समानता हो।
# जिस भक्ति में घृणा (नफरत) व भेदभाव को बोलवाला हो वह पाखण्ड कहलाता है जैसे कि इस्लाम सम्प्रदाय। दूसरे सम्प्रदायो से घृणा करने वालो व दूसरो को व्याफिर बोलने वाले – शैतान इस्लाम – शेतानों का गिरोह है।
प्रेम: मर्यादा भक्ति समानता अनुशासन
# हिन्दू, पारसी, यहूदी, ईसाई मर्यादा (लक्ति समानता आपस में सब भाई-भाई
अनुशासन
# हिन्दू सनातन, जैन, बौद्ध, सिख व अन्य
# मुसलमान शैतान होते है व EX-MUSUM अच्छे होते है। इस्लाम PIECE (टुकड़ो) का सम्प्रदाय है।
गृह निर्माण संरचना की अनुकूल दिशाएँ :-
बृहत्संहिता, नारद संहिता और वास्तुराजबल्ल्भ आदि वास्तु की शास्त्रीय पुस्तकें निवास स्थान को सोलह भागों में विभक्त करती है। भिन्न-भिन्न कक्षों का विभिन्न दिशाओं मे विशेष प्रयोजन के लिए स्थान निर्धारित किया गया है। द्वार के लिए विशेष स्थान चयन कर लेने के पश्चात घर के अन्दर भिन्न-भिन्न कक्षों के लिए जैसे स्नानागार, रसोईघर, शयन कक्ष और भोजन कक्ष आदि को विशेष स्थान प्रदान किया गया है, जैसे कि स्नानागार पूर्व में, रसोईघर आग्नेय कोण में और शयनकक्ष दक्षिण दिशा में शुभ है।
आधुनिक संदर्भ में आवासीय भवनों में इन सोलह कक्षों के अलावा कुछ वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार विविध कार्यों के लिए भूखण्ड की भिन्न-भिन्न दिशाओं में विभिन्न कक्षों का उल्लेख है। इन कमरों के लिए वैकल्पिक दिशा और क्षेत्र भी निर्धारित है। यदि मकान मे कोई कक्ष गलत जगह पर हो तो उसे उचित स्थान पर बदला जा सकता है।